मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में पिछले 16 वर्षों से भविष्य दिव्यांग विद्यालय के निशक्त बच्चों द्वारा इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं बनाकर बाजार में स्वेच्छा राशि पर लोगों के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इन मूर्तियों की खाश बात है कि इन्हें बनाने वाले यह बच्चे निशक्त है (एब्नार्मल) जिनमें से कोई बोल नहीं सकता, किसी के हाथ सही से काम नहीं करते, किसी का दिमाग काम नहीं करता है यही बच्चे मिलकर मिट्टी,गोंद,रुई को मिलाकर प्रतिमाओं का निर्माण करते है। संस्था के मुताबिक मिट्टी की प्रतिमाओं को बनाने में इन विशेष बच्चों में यह थैरेपी का काम करती है और शरीर के लिए यह थैरेपी महत्वपूर्ण है ।इस बार भी बच्चों ने हर बार की तरह नई थीमों पर गणेश जी की प्रतिमाओं को तैयार किया है।

विशेष विद्यार्थी मुनमुन बताती है गणेश जी बना रहे हैं गणेश जी में मिट्टी मिलते हैं पानी मिलाते हैं रुई मिलाते हैं मैडम और हम इन्हें बनाते हैं, सर ने हम सबको सिखा दिया है। हम सब मिलकर गणेश जी बनाते हैं मैंने भी बहुत सारे गणेश जी बनाए हैं।
विशेष विद्यार्थी मयंक गुप्ता बताते हैं कि यहां पर गणेश जी बना रहे हैं 16 साल से गणेश जी बना रहे हैं। गोंद मिलाते है, पानी और रुई मिट्टी में मिलते हैं और लड्डू बनाकर गणेश जी बनाते हैं।
संस्था की बालिका रंजना वर्मा बताती है यहां पर गणेश जी बना रहे हैं कई सालों से गणेश जी बना रहे हैं 16 साल से हम बना रहे है। इसमें गोंद मिलाते हैं,रुई डालते हैं और पानी डालकर गणेश जी बनाते हैं यहां हम लड्डू और गोली बनाते हैं।
संस्था की संचालिका अफरोज खान बताती है कि 16 वर्षों से इको फ्रेंडली मिट्टी के गणेश जी का निर्माण कर रहे हैं उन्होंने बताया कि हमारे यहां बच्चे दिव्यांग बच्चों की कैटेगरी है स्टेप बाय स्टेप सिखाया जाता है। पूरे बच्चे जिनमें कोई हाथ बनता है कोई सूंड बनाता है, कोई लड्डू बनाते हैं, उसके बाद जो अलग-अलग उनके पार्ट्स बन जाते हैं तो उसको गणेश जी का रूप दे दिया जाता है। हमारे बच्चे कुछ वोकेशनल ट्रेनिंग पर थे वह पूरी तरीके से सीख चुके हैं। वह बताती है कि मिट्टी में गोंद मिलाते हैं, रुई मिलाते हैं जिससे मिट्टी का बेस तैयार होता है फिर उसके बाद इसका उपयोग में लेते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार हमने एक पेड़ मां के नाम, ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था उसे पर हमने मजबूत भारत बनाए हैं,साथ ही नर्मदा को स्वच्छ रखने के लिए संदेश देते हुए नर्मदा घाट का बच्चों द्वारा डेकोरेट किया है। इसके अलावा इस बार थीम रखी है। खाने की थालियां में जो प्लेट भर लेते हैं इसमें गणेश जी संदेश देते हुए कह रहे हैं कि उतना ही लें थाली में फेंका न जाए नाली में। इस प्रकार के संदेश गणेश जी देते हैं। उन्होंने बताया कि संस्था में कुल 37 बच्चे हैं। जिनमें से 15 बच्चे वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए तैयार हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि हम लोगों की सोच यह है कि भगवान का कोई मोल नहीं है, जो भी कोई स्वेच्छा राशि देता है तो उसे हम स्वीकार कर लेते हैं।